Friday, October 26, 2012

बजेगी थाली, मनेगा जन्मदिन
बेटियों को बचाने को लेकर अनूठा प्रयास, स्वास्थ्य विभाग ने शुरू किया ‘‘पधारो म्हारी लाडो’’ जागरूकता महाअभियान  
बाडमेर। राजस्थान के सुदूर सीमावर्ती क्षेत्र में बसा बाडमेर जिला इन दिनों बेटियों को बचाने के लिए चलाई गई मुहिम को लेकर खासा चर्चा में है। जिले में कहीं बेटी का जन्म दिन मनाया जा रहा है तो कहीं बेटियों के जन्म पर थाली बजाई जा रही है। यही नहीं कार्यक्रमों का आयोजन कर उन्हें उपहार भी भेंट किए जा रहे हैं। सुकून भरा और सकारात्मक तथ्य यह है कि मुहिम सरकारी विभाग द्वारा शुरू की गई है, जो बेहद चर्चा में है। दरअसल, राजस्थान के इस जिले में लिगांनुपात की स्थिति काफी दयनीय है। यहां 0 से छह वर्ष आयु तक के आंकड़ों में 1000 लड़कों पर केवल 899 लड़कियां है। शायद यही वजह रही कि स्वास्थ्य विभाग को ‘‘पधारो म्हारी लाडो’’ अभियान की शुरूआत करनी पड़ी। हालांकि विभाग ने कन्या भू्रण हत्या के साथ ही बेटे-बेटियों के बीच किए जा रहे भेदभाव को लेकर भी अलख जगाई है।
अभियान को लेकर यहां की जिला प्रमुख मदनकौर बताती हैं कि ‘‘पधारो म्हारी लाडो’’ एक अनूठा व अभिनव प्रयास है, जिसके जरिए हम समाज को झकझोर सकते हैं। हम कन्या भू्रण हत्या पर अंकुश लगाने के साथ ही लिंग आधारित भेदभाव को कम कर सकते हैं। वे बताती हैं कि एक वर्षीय इस मुहिम की शुरूआत शहर के एक आंगनबाड़ी केंद्र के साथ ही जिले की तहसील बायतु के एक गांव खानजी का तला से की गई। पहले दिन जहां अनेक बच्चियों के जन्मदिवस पर केक काटकर खुशी मनाई गई, वहीं एक बच्ची के जन्म पर थाली भी बजाई गई। वे कहती हैं कि वर्तमान समाज में बेटियों को लेकर अब भी भेदभाव किया जाता है। बेटे का जन्मदिन मनाया जाता है, बेटे के जन्म पर थाली बजती है और उन्हें अच्छी तालीम भी मिलती है, लेकिन बेटी को इन सब खुशियों से वंचित रखा जाता है। यही वजह है कि इस मुहिम की जरूरत आन पड़ी। इसी तरह यहां के युवा प्रधान (पंचायत समिति, चैहटन) शमा बानो कहती हैं कि जब तक हम ऐसे अभियान नियमित रूप से नहीं चलाएंगे, जब तक जनजागृति पैदा नहीं करेंगे बेटियां यूं ही कम होती जाएंगी। वे आए दिन झाडि़यों, सड़कों और गटर में मिलने वाले कन्या भू्रण से आहत होते हुए कहती हैं कि ये सभ्य समाज की तस्वीर नहीं है और हमें इस कुकृत्य को हर हाल में मिटाना होगा।
बेटियों की हुई मनुहार
शहर के आंगनबाड़ी केंद्र नंबर 20 पर आयोजित समारोह में राधिका, पूनम, भूमिका और मानसी का जन्मदिवस मनाया गया। सभी बालिकाओं को शिक्षण सामग्री उपहार स्वरूप प्रदान की और अन्य बच्चों को टाॅफियां वितरण की गई। इसी तरह बायतु तहसील के खानजी का तला गांव में सलमा व भानूप्रिया का जन्मदिन मनाकर उन्हें शिक्षण सामग्री दी गई। तीन माह तक की बच्चियों दुर्गा, बबली, भगवती, मीरां, गंगा, बरजू एवं अचली को स्वास्थ्य सुरक्षा सामग्री प्रदान की गई।
एक वर्ष चलेगा अभियान
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के आईईसी अनुभाग द्वारा शुरू किए गए इस अभियान में सुप्रसिद्ध कंपनी केयर्न इंडिया सहित गैर सरकारी संगठन स्माईल फाउंडेशन व हेल्पेज इंडिया भी सहयोग कर रहे हैं। विभाग के जिला आईईसी समन्वयक विनोद बिश्नोई बताते हैं कि अभियान नियमित रूप से एक वर्ष तक चलेगा। जिले में तीन माह की बेटियों को स्वास्थ्य सामग्री और एक से तीन वर्ष तक की बच्चियों को शिक्षण सामग्री दी जाएगी। प्रत्येक माह कार्यक्रम आयोजित कर आमजन में जागरूकता पैदा की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चियों का जन्मदिन मनाया जाएगा। इसके अलावा सभी स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि स्वास्थ्य केंद्रों पर बच्ची के जन्म पर स्वास्थ्य कार्यकर्ता अथवा आशा सहयोगिनी के जरिए थाली बजाई जाए।


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Sunday, August 14, 2011

जन गण मन की कहानी

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।
उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "
जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।
उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।
रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।
1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।
गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम"।
नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।
बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।
नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।
तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?

जय हिंद |

Monday, July 18, 2011

गुमनाम सी ये जिंदगी......

 
गुमनाम सी ये जिंदगी..........कभी खलासी तो कभी शनि उपासक बनती है। नेहरू, गांधी के दावे, दावे ही रह गए...... न बचपन बदला.... न बदहाली।

Monday, February 14, 2011

विवेक स्वतंत्रता चाहता है...


व्यक्ति, जितना बुद्धिमान होगा, उतना स्वयं के ढंग से जीना चाहेगा। सिर्फ बुद्धिहीन व्यक्ति पर ऊपर से थोपे गए नियम प्रतिक्रिया, रिएक्शन पैदा नहीं करेंगे। तो, दुनिया जितनी बुद्धिहीन थी, उतनी ऊपर से थोपे गए नियमों के खिलाफ बगावत न थी। जब दुनिया बुद्धिमान होती चली जा रही है, बगावत शुरू हो गई है। सब तरफ नियम तोड़े जा रहे हैं। मनुष्य का बढ़ता हुआ विवेक स्वतंत्रता चाहता है

Sunday, February 6, 2011

धर्म के नाम पर


लाज लुटती है दंगों में किसी सीता की
सारे पैगम्बरों की नींद उचट जाती है
कत्ल जब राम का कोई रहीम करता है
कुरान-ए-पाक भी उदासी में सिमट जाती है
लाश बेटे की आंसुओं से भीगोने वाला
बाप तो बाप है हिंदू या मुसलमान नहीं
मां की रोती हुई ममता की कोई जात नहीं
बहन के गम की कोई मजहबी पहचान नहीं
जो हुमायुं की कलाई पर बांधे थे कभी
तुम्हें कसम उन रेशमी धागों की
कसम है तुम्हें नानक ओ चिश्ती की आत्माओं की
सारी दुनिया को जो पैगाम-ए-अमन देती हैं
अब कोई कत्ल न हो मजहबी जुनूं के लिए
धर्म के नाम पर कोई लाश न गिरने पाए
अब कोई मां न करे जवां बेटे को रुखसत
किसी बहन के हाथों में राखी मुरझाए
हैं एक मां के बेटे, सारे ही देशवासी
बाहें गले में डाले, मिलकर चलें दुबारा
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलसितां हमारा.

साभार  - दिलचस्प 

Friday, January 21, 2011

नया भारत, क्रांति शुरू हो गई है : ओशो


अतीत के इतिहास में क्रांतियाँ होती थीं और समाप्त हो जाती थीं। लेकिन आज हम सतत क्रांति में जी रहे हैं। अब क्रांति कभी समाप्त नहीं होगी। पहले क्रांति एक घटना थी, अब क्रांति जीवन है। पहले क्रांति शुरू होती थी और समाप्त होती थी। अब क्रांति शुरू हो गयी और समाप्त नहीं होगी। अब आने वाले भविष्य में मनुष्य को सतत क्रांति और परिर्वन में ही रहना होगा। यह एक इतना बड़ा नया तथ्‍य है, जिसे स्वीकार करने में समय लगना स्वाभाविक है।

Saturday, November 6, 2010

बारूद पर ढेर है भारत का भविष्य

एक बच्चा पटाखा बनाए और दूसरा उसे जलाकर दीपावली मनाए. ऐसी विडम्बना तमिलनाडु के शिवकाशी में आसानी से देखी जा सकती है. जहां एक ओर देश के हरेक कोने का बचपन रोशनी के पर्व को मनाने के अपने तरीके व योजना बना रहा है, वहीं शिवकाशी जो आतिशबाजी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जहां करीबन 40 हजार बाल मजदूर उनकी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए पटाखे बनाने में सक्रिय हैं. शिवकाशी वह क्षेत्र है जिसे देश की आतिशबाजी राजधानी के रूप में जाना जाता है. यहां लगभग एक हजार छोटी-बड़ी इकाइयां बारूद व माचिस बनाने में बनाने में जुटी हैं जिनका सालाना कारोबार 1000 करोड़ रूपए है. इस उद्योग के चलते एक लाख लोगों की रोजी चलती हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं.
बाल श्रम नाम के अभिशाप की जहां बात चल ही गई है तो यह स्पष्ट कर दें कि शिवकाशी में इसका प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है. मसलन, पंद्रह वर्षीय पोन्नुसामी जो यहां एक पटाखा निर्माणी इकाई में कार्यरत है, पांच साल पटाखे बना रहा है. जब उसने यह पेशा चुना तो उसकी समझ का स्तर क्या रहा होगा यह विचारणीय मसला है. उसके अनुसार वह छठी कक्षा का छात्र था जब उसे जबरन इस काम में उतार दिया गया. काम कराने की मंशा भी उनके माता-पिता की ही थी.प्रतिदिन नौ घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वह 60 रूपए पाता है. यह बेगारी उसे वयस्क श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी का केवल चालीस फीसदी है. ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि शिवकाशी इलाके के किशोर-किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई में गाज गिरने की आशंका रहती है. छोटी उम्र में ही ऐसे खतरनाक काम में झोंकने के मां-बाप के फैसले के पीछे उनकी गरीबी ही मूल कारण है.
कारखानों में हादसे सामान्यत: होते रहते हैं. ऐसे में मासूमों को घातक काम पर लगाने का सवाल जब उठता है तो श्रमिक संगठनों का जवाब होता है कि मृतकों में कोई भी किशोर नहीं है,जबकि दास्तां कुछ अलग ही है. जुलाई 2009 में हुई एक दुर्घटना में तीन बच्चे मर गए. अगस्त 2010 में तो सरकारी अधिकारियों पर ही गाज गिरी जो अनाधिकृत पटाखा इकाइयों की जांच पर गए थे. बताया गया है कि 8 राजस्व और पुलिस अधिकारियों को इस तहकीकात के दौरान जान से हाथ धोना पड़ा. जब पोन्नुसामी से काम के जानलेवा होने के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब यही था कि अगर मैं भाग्यशाली हूं तो कभी हादसा नहीं होगा. बच्चों के अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अधिकारी जॉन आर की मानें तो शिवकाशी में करीबन 1050 कारखाने हैं जिनमें से 500 बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं. पटाखों के अलावा 3989 कारखानों में दियासलाई बनती है. वे मानते हैं देश-विदेश में हो रहे प्रयासों के नतीजतन बाल श्रम पर कुछ अंकुश लगा है. हादसों में इजाफा और बच्चों के काम पर लगाने की नौबत गैर लाइसेंसशुदा कारखानों की वजह से आती है जिनका संचालन घरों की असुरक्षित चारदीवारी में होता है. इन लोगों को लाइसेंस वाली कंपनियां पटाखे बनाने का आदेश दे देती है. अधिक फायदे के लालच व शिक्षा के अभाव में ये लोग आसानी से कानून की दहलीज को लांघ जाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर शिवकाशी की ही एक एनजीओ के कार्यकर्ता के अनुसार इस समस्या के बारे में समझ अभी अधूरी है. हम अभिभावकों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें यह समझाया जा रहा है कि वे सीमित आमदनी में गुजर-बसर करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान दें. कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. इसी तर्ज पर सरकार, प्रशासन व एनजीओ का प्रयास भी तब तक सफल नहीं हो जाता जब तक कि अन्य पक्षकार जिनमें आतिशबाजी निर्माण इकाइयों के मालिक व अभिभावक शामिल हैं, स्वेच्छा से पहल न करें. अन्यथा उनकी दीपावली कभी भी प्रकाशमान नहीं हो पाएगी. साभार - शिरीष खरे

Saturday, October 30, 2010

सरहद पर परेशान किसान

श्रीगंगानगर। भारत-पाक सरहद पर बसे किसान इन दिनों खासी परेशानी का सामना कर रहे हैं। हालाद इस कदर बिगड़े हुए हैं कि किसान मरने तक को तैयार हैं, लेकिन उनकी समस्या पर न तो नौकरशाह गौर कर रहे हैं और न ही सफेदपोश। दरअसल, लंबे समय से विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे किसानों के सामने हाल ही में आए एक सरकारी फरमान ने कई दुविधाएं खड़ी कर दी हैं'। इस फरमान के मुताबिक सीमा क्षेत्र में तारबंदी के पार दो फिट से ज्यादा ऊंची फसल पर पाबंदी लगा दी गई है। जबकि किसान सीमा क्षेत्र में जो भी फसल बोते हैं, उनकी ऊंचाई दो फिट से अधिक ही है। उक्त समस्या को लेकर किसान जिला प्रशासन से मिल चुके हैं और वे सरकार को भी अपनी समस्या से अवगत करवा चुके हैं। बहरहाल, किसान गुजारिश करते दिखे कि या तो उनकी जमीन को सरकार अपने कब्जे में लेकर हमें मुआवजा दे दे या सीमा पर खड़ा कर हमें गोली मार दे। वाकई में, यदि हालात यही रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इस साधन-संपन्न जिले के सीमावर्ती किसान रोटी-रोटी को मोहताज हो जाएंगे।
यहां के ग्रामीण बताते हैं कि वे लंबे समय से परेशान हैं, लेकिन उनकी समस्या सुनने वाला कोई नहीं है। न तो सरकार और न ही अधिकारी इस ओर ध्यान दे रहे हैं तथा नेताओं से उम्मीद करना ही बेमानी लगता है। सीमावर्ती गांव खखां के दारासिंह कहते हैं कि जब से दो फिट से ऊंची फसल न बोने का फरमान आया है, वह इसी ऊहापोह में है कि आखिर खेत में क्या बोएगा। खुद के साथ-साथ उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता भी सताने लगी है। बकौल दारासिंह, 'पता नहीं वो कौन सी मनहूस घड़ी थी, जब सियासतदानों की कारगुजारियों के चलते देश का बंटवारा हुआ और आज हमें ये दिन देखने को मिले। अब तो हर रोज नई समस्या से जूझना हमारी नियती बन चुका है, लेकिन अब और बर्दास्त नहीं होता।' इसी तरह बुजुर्ग गुरप्रीतकौर कहती हैं कि यहां वर्ष 1984 के दौरान तारबंदी होनी शुरू हुई और करीब 22 वर्ष पूर्व (वर्ष 1989) तक यहां तारबंदी हो चुकी थी। इसी के साथ ही उनके बुरे दिन शुरू हो गए, क्योंकि तारबंदी के दौरान उनकी जमीनें उस पार चली गई। ऐसी ही बदहाल स्थिति गुरजंटसिंह के परिवार की है। ग्वार की फसल पकान पर है, लेकिन उसे काटने की इजाजत नहीं मिल रही है। गुरजंटसिंह नेताओं व अधिकारियों से मिलकर वह गुजारिश करता घूम रहा है कि सरकार उसे गोली मार दे तो ठीक है, ताकि सारी समस्या ही खत्म हो जाए। गुरजंटसिंह ने बताया कि उसकी जमीन में कॉटन व सरसों की फसल बहुत अच्छी होती है, लेकिन जो आदेश जारी किए गए हैं वे तो सरासर अन्याय है। अपने जवान बेटे को खो चुकी नसीबकौर ने बताया कि तारबंदी के उस पार जमीन होने के कारण हमेशा ही संकट खड़े होते रहे हैं। यही वजह है कि उनका एक बेटा मजदूरी करता-करता चल बसा। अब दो बेटियों की शादी करनी है, लेकिन नसीबकौर दो जून की रोटी को भी तरस रही हैं। बहरहाल, किसानों को केंद्र व राज्य सरकार से अब भी आस बंधी हुई है।
किसानों का कहना है कि यदि पंजाब में जमीनों का मुआवजा दिया जा सकता है तो फिर राजस्थान के किसानों से सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है? यही नहीं यदि सुरक्षा के नाम पर ऐसे आदेश जारी किए जाते हैं तो फिर दूसरे इलाकों में तारबंदी के समीप हालात बदतर क्यों है और सरकार उस इलाके के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती? आखिर हमेशा से ही किसी न किसी तरह की मार झेलते आ रहे किसान ही इस आदेशों की चपेट में क्यों आ रहे हैं? वो भी उस हालात में जब किसान अपनी जमीन सरकार को सौंपने को तैयार हैं? उधर जिला कलेक्टर सुबीर कुमार भी मानते हैं कि किसानों की समस्या जायज है तथा वे कहते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर बीएसएफ ने एक नॉटीफिकेशन जारी किया है, जिसके मुताबिक किसान तारबंदी के पास दो फिट से ऊंची फसल की बुआई नहीं कर सकेंगे। उनका मानना है कि निश्चित ही यह सुरक्षा का मुद्दा है, लेकिन किसानों की समस्या भी वाजिब है। जैसे भी संभव होगा, हम किसानों की इस जायज मांग को राज्य सरकार के जरिए केंद्र सरकार तक पहुंचाएंगे। 

Saturday, October 2, 2010

पेट नहीं जोश से रिक्शा खींचता है नेत्रहीन संतोष

मधुबनी। अशोक चक्रधर की एक कविता है - आवाज देकर रिक्शे वाले को बुलाया, वो कुछ लंगड़ाता हुआ आया। मैंने पूछा - यार, पहले ये तो बतलाओ, पैर में चोट है कैसे चलाओगे?  रिक्शेवाले ने कहा - बाबूजी, रिक्शा पैर से नहीं, पेट से चलता है। मगर, बिहार के बेनीपंट्टी का संतोष तो इस तर्जुमे से भी आगे निकल गया है। वह दोनों आंखों से अंधा है और परिवार के पेट की खातिर छोटे भाई के साथ रिक्शा खींच रहा है। वह पैडल मारता है और उसका छोटा भाई हैंडल संभालता है। यह एक इंसान के जीवन के प्रति असीम उत्साह की कहानी तो है ही, जीवन के किसी भी मोड़ पर हार को स्वीकार नहीं करने का संदेश भी देती है। मधुबनी जिले के बेनीपट्टी ब्लॉक के कछड़ा गांव के बसवरिया टोला निवासी इन भाइयों में नेत्रहीन संतोष राम की उम्र 16 साल और राजू महज 12 वर्ष का है। गरीबी की मार और पिता की बीमारी से त्रस्त होकर दोनों भाइयों ने रिक्शा चलाने का फैसला किया। दोनों आंखों से नेत्रहीन संतोष रिक्शा की चालक सीट पर बैठ कर दोनों पांवों से पैंडल मारता है और उसके आगे बैठकर छोटा भाई राजू राम हैंडल व ब्रेक संभालता है। दोनों रिक्शा लेकर सुबह से ही मुसाफिरों की खोज में निकल पड़ते हैं। अकौर बेनीपट्टी और बनकट्टा की पांच किलोमीटर की परिधि में इन्हें रिक्शा चलाते देखा जा सकता है। लोगों की सहानुभूति भी इनके साथ होती है। कहीं आने-जाने के लिए सबसे पहले लोग इन्हें ही तलाश करते हैं। मां जया देवी कहती हैं कि संतोष के पिता मोहित राम पांच साल से टीबी से पीडि़त होकर मौत से जूझ रहे हैं। उनके बीमार पडऩे पर तीन भाइयों, पांच बहनों और माता-पिता की देखभाल का भार संतोष के कंधे पर आ पड़ा। संतोष ने हिम्मत नहीं हारी। उसने छोटे भाई की मदद से परिवार की गाड़ी खींचने का अदम्य साहस दिखाया और परिवार की परवरिश में जुट गया। रोटी-कपड़ा के साथ-साथ पिता का इलाज भी संतोष के लिए चुनौती थी। उसने इसे स्वीकारा। इसमें उसने अपनी लाचारी को आड़े नहीं आने दिया। पिता को बैंक ऋण के रूप में मिले रिक्शे को दोनों भाई एक साल से चला रहे हैं। 
साभार : - आमोद कुमार झा, जागरण

Sunday, August 29, 2010

सरहद पर बंधी रिश्तों की डोर

-भारत-पाक सीमा पर बहनों ने बांधी सैनिक भाइयों के राखी, भावुक हुए सैनिक - भर आई अखियां
श्रीगंगानगर।      सरहद पर बंदूकों के साए में प्रेम की कामना करना भी बेमानी लगता है, लेकिन इस बार रक्षाबंधन पर्व पर भाई-बहन के प्रेम भरे अटूट रिश्ते ने यहां ऐसा प्रेममयी माहौल पैदा किया कि हर कोई भावुक हो उठा। खून से सनने वाले मैदान पर खुशी के आंसू टपके तो घृणा की जगह प्यार प्रफुल्लित हुआ। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत-पाकिस्तान की सरहदी चौकी हिंदुमलकोट की, जहां इस बार रक्षाबंधन का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। श्रीगंगानगर व हिंदुमलकोट से पहुंची अनेक युवतियों ने सरहद पर पहुंचकर सैनिक भाईयों की कलाइयों पर राखी बांधी और उनकी दीर्घायु की कामना की। वहीं सैनिक भाइयों ने भी बहनों, उनके सुहाग व देश की रक्षा की शपथ ली। 




श्रीगंगानगर से महज 20 किलोमीटर दूर हिंदुमलकोट सरहद चौकी पर रक्षाबंधन पर्व पर कई युवतियां विशेष रूप से सैनिकों के राखियां बांधने पहुंची। हाथों में पूजा की थाल व राखियां लिए जब ये बहनें सैनिक भाइयों तक पहुंची तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अक्सर हाथों में बंदूक थामे सैनिक भाईयों ने कल्पना ही नहीं की थी कि उनकी ये अनजान बहनें यूं राखी बांधने पहुंच जाएंगी। पर जैसे ही इन बहनों ने सैनिकों के राखी बांधी तो माहौल एकबारगी भावुकता से भर उठा और सैनिकों की आंखे भर आई। यहां पहुंची युवतियां भी सैनिकों के इस स्नेह व प्यार तथा घर से दूर रहने के दर्द को देख अपने आंसू नहीं रोक पाई। बोर्डर पर राखी बांधने पहुंची अशोकनगर निवासी रश्मी अरोड़ा ने इन भावुक पलों के बीच बताया कि उसका कोई भाई नहीं है और इसी कारण वह सैनिक भाईयों को राखी बांधने आई है। उन्होंने कहा कि सैनिक भाईयों से बढ़कर शायद ही कोई भाई हो जो हमारी और हमारे देश की रक्षा कर सके। ऐसे ही प्रीति ने कहा कि सैनिकों का घर, परिवार हम ही तों है और इसलिए हर बार इन्हें राखी बांधने आएंगी। हिंदुमलकोट की रीना का भी यही मानना है, वे कहती हैं कि यदि सैनिक भाई हमारी रक्षा की खातिर घर से इतनी दूर बैठे हैं तो हमारा भी फर्ज बनता है कि हम इन सच्चे व वीर भाईयों की कलाइयों पर राखी सजाएं। भावुक हुए सैनिक भी इन बहनों के स्नेह को पाकर बेहद खुश थे। उन्होंने कहा कि  घर से दूर होने के बावजूद आज उन्हें घर की कमी नहीं खल रही। सैनिकों ने कहा कि यदि हर वर्ष, हर त्यौहार पर ऐसा माहौल हर बोर्डर चौकी पर हो तो उनके हौसलो को चार चांद लग जाएंगे। 


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Wednesday, June 2, 2010

मां तूझे सलाम

सुरमाओं की धरा हिंदुस्तान के सैनिक जहां सरहदों पर दुश्मन के छक्के छुड़वाते हैं, वहीं उनके होनहार नन्हे-मुन्ने सपूत भी किसी से कम नहीं  है। वे यदा-कदा मौका मिलने पर खुद की काबलियत को पेश कर ही देते हैं। ऐसा ही एक सुनहरा व रंगारंग मौका उन्हें राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में स्थित साधुवाली सैन्य छावनी में मिला। बस, फिर क्या था.........यहां इन लाडलों ने ऐसा रंग जमाया कि देखने वालों ने दांतो तले अंगूली दबा ली। निश्चित ही उन्होंने सरहद पर सीना तान खड़े अपने रणबांकुरे पिता को गौरवांवित कर दिया।
कार्यक्रम का आयोजन राजस्थान की स्पेशल 13 गर्नेडियर गंगा जैसलमेर की ओर से किया गया। जिसमें सैन्य कर्मियों के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने धूम मचा दी। यहां प्रस्तुत राजस्थानी झांकी को हर कोई निहारने पर मजबूर हो गया। फिर वो चाहे चरखा चलाती सोहणी मुटियार हो या ऊंट पर बैठा गबरू, या फिर चूल्हे पर खाना बनाती गजबण नार या चौपाल में हथाई करते बुजुर्गवार। इस पर राजस्थानी परिधान में सजे सैन्य कर्मियों ने चंग के थापों से राजस्थानी खुशबू का अहसास बखूबी दिलाया। इन्हीं दिलकश नजारों को देखिए कैमरे की नजरों से .....






Wednesday, May 26, 2010

देखा है भीड़ को

देखा है भीड़ को ढोते हुए 
अनुशासन का बोझा,
उछालते हुए अर्थहीन नारे, 
लड़ते हुए दूसरों का युद्ध।
खोदते हुए अपनी कब्रें, 

पर .....नहीं सुना .....

तोड़ लिया हो 
कभी किसी भीड़ ने व्यक्ति की अंत:स्चेतना में खिला
अनुभूति का आम्लान पारिजात.....




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Friday, May 21, 2010

विकासशील नहीं, आज हम विकसित होते


                      -पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष आलेख
भारत के सबसे युवा व नौवें प्रधानमंत्री राजीव गांधी के न होने का खामियाजा आज हम इस रूप में भुगत रहे हैं कि हमारा देश अब भी विकासशील देशों की श्रेणी में खड़ा जद्दोजहद कर रहा है। यदि राजीव गांधी हमारे बीच होते तो निश्चित ही देश विकसित देशों की फेहरिस्त में शामिल होता। देश के इस सपूत व बेहद मृदु भाषी व्यक्तित्व के धनी प्रधानमंत्री को हमने आज ही के दिन खो दिया था। उनकी तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी सभा के दौरान विस्फोट से हत्या कर दी गई थी। यह दसवीं लोकसभा के लिए चुनाव प्रचार का समय था, जो निहित ही स्वार्थी नेताओं द्वारा देश के माथे पर थोंपा गया।  देश के इस युवा नेता के लिए 23 जून 1980 का दिन बेहद उथल-पुथल व परिवर्तन लेकर आया। दरअसल, छोटे भाई संजय गांधी की विमान हादसे में मौत और मां इंदिरा गांधी का राजनीति में आने का आदेश मिलने के बाद न चाहते हुए भी राजनीति में कूदे थे। संजय गांधी शुरुआत से ही राजनीति में रुचि रखते थे, जबकि राजीव गांधी राजनीति से कोसों दूर थे। मुंबई में जन्मे और दून स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वर्ष 1961 में लंदन का रुख किया। इसी दौरान वर्ष 1965 में सोनिया गांंधी से मुलाकात के बाद 1968 में उनसे शादी की। इसी बीच वे इंडियन एयर लाइंस में बतौर पायलट सेवा देने लगे। लेकिन संजय गांधी की आकस्मिक मौत के बाद उन्हें 1981 में अमेठी से पहला चुनाव लडऩा पड़ा और शरद यादव को करीब दो लाख मतों से हराते हुए रिकॉर्ड जीत हासिल की। वर्ष 1984 में उन्होंने मेनका गांधी को इसी सीट से हराया। यहां से लोकसभा पहुंचने के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता शुरू हो चुकी थी और उनकी छवि बेहद सौम्य, अविचल मुस्कान व मृदु भाषी वाली बनती गई। वे कांग्रेस महासचिव भी बने और राजनीतिक पारंगत्ता का परिचय देते हुए उन्होंने श्रीमति इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद लोकसभा चुनाव समय पूर्व करवाए। जबकि वे निर्वाचित सदस्य भी थे और कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत था। उनकी सूझबूझ का नतीजा यह था कि भारत के इतिहास में कांग्रेस ने 542 में से 411 सीटें जीतकर एक नया रिकार्ड बनाया और देश के प्रथम युवा प्रधानमंत्री के रूप में हमें राजीव गांधी मिले। वे 31 अक्टूटर 1984 से दो दिसंबर 1989 तक प्रधानमंत्री पद पर रहे। जिस संचार क्रांति पर आज हम और पूरा भारत देश हुंकार भरता है, उसे भारत स्थली पर खड़ा करने का श्रेय इन्हीं युगदृष्टा को जाती है। बकौल गांधी, 'मैं युवा हूं और मेरे कुछ सपने हैं, जिनमें सबसे बड़ा स्वप्न यह है कि मेरा देश स्वतंत्र, सशक्त और आत्मनिर्भरता के साथ मानवता की सेवा करने वाला अग्रणी राष्ट्र हो।' शायद यही वजह थी कि उन्होंने एक एतिहासिक निर्णय लेते हुए मतदान की निर्धारित न्यूनतम आयु सीमा 21 वर्ष को घटाकर 18 वर्ष किया, जो निश्चित ही देश के युवाओं के लिए सौगात थी। युवा सोच के मद्देनजर ही उन्होंने देश में कंप्यूटर क्रांति को जन्म दिया और आज देश में ऑफिस से लेकर घरों तक ही नहीं बल्कि सड़कों पर लैपटोप नुमा कंप्यूटर के साथ देश प्रगति के सौपानों को छू रहा है। यही नहीं उन्होंने भ्रष्टाचार के खात्मे को लेकर भी विशेष रणनीति अख्तियार की, लेकिन उसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। निसंदेह राजीव गांधी एक ऐसे शासनाध्यक्ष थे जिन्होंने सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का साहस किया और माना कि जनकल्याण के लिये केंद्र से भेजे गये एक रूपये में से 87 पैसे भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ जाता है। उधर तत्कालीक समय में आतंक भी सर चढ़ कर बोल रहा था। पंजाब से लेकर असम तक आतंकवादी गतिविधियां चरम पर थीं। पंजाब में आतंकवाद को लेकर उन्होंने संत हरचरण सिंह लोंगोवाल समझौता किया, जिसकी परिणति आतंकवाद खत्म हो सका। असम में अलग समस्या थी, यहां पंजाबियों और मारवाडिय़ों का स्थानीय लोग विरोध कर रहे थे, लेकिन गांधी ने इस खाई का पाटने का अहम प्रयास किया। लेकिन अंतत: यही आतंकी साया और मानवीय कू्रर रूप ने युवा राजीव  को लील गया। 21 मई 1991 के दिन एक आत्मघाती महिला विस्फोटक ने उन्हें हमसे छीन लिया। निश्चित ही आज देश में उनकी कमी खल रही है, वर्तमान राजनीतिक दुराचार, गिरते स्तर व नेताओं के ओछेपन के चलते देश के लोग उन जैसे प्रधानमंत्री की चाह रखते हैं।



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Wednesday, May 19, 2010

मजहबी कागजो पे नया शोध देखिये...

मजहबी कागजो पे नया शोध देखिये।
वन्दे मातरम का होता विरोध देखिये।
देखिये जरा ये नई भाषाओ का व्याकरण।
भारती के अपने ही बेटो का ये आचरण।
वन्दे-मातरम नही विषय है विवाद का।
मजहबी द्वेष का न ओछे उन्माद का।
वन्दे-मातरम पे ये कैसा प्रश्न-चिन्ह है।
माँ को मान देने मे औलाद कैसे खिन्न है।
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मात भारती की वंदना है वन्दे-मातरम।
बंकिम का स्वप्न कल्पना है वन्दे-मातरम।
वन्दे-मातरम एक जलती मशाल है।
सारे देश के ही स्वभीमान का सवाल है।
आह्वान मंत्र है ये काल के कराल का।
आइना है क्रांतिकारी लहरों के उछाल का।
वन्दे-मातरम उठा आजादी के साज से।
इसीलिए बडा है ये पूजा से नमाज से।
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भारत की आन-बान-शान वन्दे-मातरम।
शहीदों के रक्त की जुबान वन्दे-मातरम।
वन्दे-मातरम शोर्य गाथा है भगत की।
मात भारती पे मिटने वाली शपथ की।
अल्फ्रेड बाग़ की वो खूनी होली देखिये।
शेखर के तन पे चली जो गोली देखिये।
चीख-चीख रक्त की वो बूंदे हैं पुकारती।
वन्दे-मातरम है मा भारती की आरती।
(विरोध करने वालो ने कहा की मुसलमान वंदे-मातरम इसलिए नही गायेंगे क्योंकि उनका मजहब इसके पक्ष में नही है....तब एक प्रश्न जन्म लेता है...की क्या जिन मुसलमानों ने वंदे मातरम गाते गाते अपने प्राण माँ भरती के चरणों में समर्पित कर दिए वो सच्चे मुसलमान नही थे....या जो विरोध कर रहे हैं वो सच्चे मुसलमान नही हैं॥?)

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वन्दे-मातरम के जो गाने के विरुद्ध हैं।
पैदा होने वाली ऐसी नसले अशुद्ध हैं।
आबरू वतन की जो आंकते हैं ख़ाक की।
कैसे मान लें के वो हैं पीढ़ी अशफाक की।
गीता ओ कुरान से न उनको है वास्ता।
सत्ता के शिखर का वो गढ़ते हैं रास्ता।
हिन्दू धर्म के ना अनुयायी इस्लाम के।
बन सके हितैषी वो रहीम के ना राम के।
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गैरत हुज़ूर कही जाके सो गई है क्या।
सत्ता माँ की वंदना से बड़ी हो गई है क्या।
देश तज मजहबो के जो वशीभूत हैं।
अपराधी हैं वो लोग ओछे हैं कपूत हैं।
माथे पे लगा के माँ के चरणों की ख़ाक जी।
चढ़ गए हैं फांसियों पे लाखो अशफाक जी।
वन्दे-मातरम कुर्बानियो का ज्वार है।
वन्दे-मातरम जो ना गए वो गद्दार है। 

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