Saturday, October 16, 2010
Saturday, October 2, 2010
पेट नहीं जोश से रिक्शा खींचता है नेत्रहीन संतोष
मधुबनी। अशोक चक्रधर की एक कविता है - आवाज देकर रिक्शे वाले को बुलाया, वो कुछ लंगड़ाता हुआ आया। मैंने पूछा - यार, पहले ये तो बतलाओ, पैर में चोट है कैसे चलाओगे? रिक्शेवाले ने कहा - बाबूजी, रिक्शा पैर से नहीं, पेट से चलता है। मगर, बिहार के बेनीपंट्टी का संतोष तो इस तर्जुमे से भी आगे निकल गया है। वह दोनों आंखों से अंधा है और परिवार के पेट की खातिर छोटे भाई के साथ रिक्शा खींच रहा है। वह पैडल मारता है और उसका छोटा भाई हैंडल संभालता है। यह एक इंसान के जीवन के प्रति असीम उत्साह की कहानी तो है ही, जीवन के किसी भी मोड़ पर हार को स्वीकार नहीं करने का संदेश भी देती है। मधुबनी जिले के बेनीपट्टी ब्लॉक के कछड़ा गांव के बसवरिया टोला निवासी इन भाइयों में नेत्रहीन संतोष राम की उम्र 16 साल और राजू महज 12 वर्ष का है। गरीबी की मार और पिता की बीमारी से त्रस्त होकर दोनों भाइयों ने रिक्शा चलाने का फैसला किया। दोनों आंखों से नेत्रहीन संतोष रिक्शा की चालक सीट पर बैठ कर दोनों पांवों से पैंडल मारता है और उसके आगे बैठकर छोटा भाई राजू राम हैंडल व ब्रेक संभालता है। दोनों रिक्शा लेकर सुबह से ही मुसाफिरों की खोज में निकल पड़ते हैं। अकौर बेनीपट्टी और बनकट्टा की पांच किलोमीटर की परिधि में इन्हें रिक्शा चलाते देखा जा सकता है। लोगों की सहानुभूति भी इनके साथ होती है। कहीं आने-जाने के लिए सबसे पहले लोग इन्हें ही तलाश करते हैं। मां जया देवी कहती हैं कि संतोष के पिता मोहित राम पांच साल से टीबी से पीडि़त होकर मौत से जूझ रहे हैं। उनके बीमार पडऩे पर तीन भाइयों, पांच बहनों और माता-पिता की देखभाल का भार संतोष के कंधे पर आ पड़ा। संतोष ने हिम्मत नहीं हारी। उसने छोटे भाई की मदद से परिवार की गाड़ी खींचने का अदम्य साहस दिखाया और परिवार की परवरिश में जुट गया। रोटी-कपड़ा के साथ-साथ पिता का इलाज भी संतोष के लिए चुनौती थी। उसने इसे स्वीकारा। इसमें उसने अपनी लाचारी को आड़े नहीं आने दिया। पिता को बैंक ऋण के रूप में मिले रिक्शे को दोनों भाई एक साल से चला रहे हैं।
साभार : - आमोद कुमार झा, जागरण
Saturday, September 25, 2010
Sunday, September 12, 2010
Sunday, August 29, 2010
सरहद पर बंधी रिश्तों की डोर
-भारत-पाक सीमा पर बहनों ने बांधी सैनिक भाइयों के राखी, भावुक हुए सैनिक - भर आई अखियां
श्रीगंगानगर। सरहद पर बंदूकों के साए में प्रेम की कामना करना भी बेमानी लगता है, लेकिन इस बार रक्षाबंधन पर्व पर भाई-बहन के प्रेम भरे अटूट रिश्ते ने यहां ऐसा प्रेममयी माहौल पैदा किया कि हर कोई भावुक हो उठा। खून से सनने वाले मैदान पर खुशी के आंसू टपके तो घृणा की जगह प्यार प्रफुल्लित हुआ। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत-पाकिस्तान की सरहदी चौकी हिंदुमलकोट की, जहां इस बार रक्षाबंधन का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। श्रीगंगानगर व हिंदुमलकोट से पहुंची अनेक युवतियों ने सरहद पर पहुंचकर सैनिक भाईयों की कलाइयों पर राखी बांधी और उनकी दीर्घायु की कामना की। वहीं सैनिक भाइयों ने भी बहनों, उनके सुहाग व देश की रक्षा की शपथ ली।
श्रीगंगानगर से महज 20 किलोमीटर दूर हिंदुमलकोट सरहद चौकी पर रक्षाबंधन पर्व पर कई युवतियां विशेष रूप से सैनिकों के राखियां बांधने पहुंची। हाथों में पूजा की थाल व राखियां लिए जब ये बहनें सैनिक भाइयों तक पहुंची तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अक्सर हाथों में बंदूक थामे सैनिक भाईयों ने कल्पना ही नहीं की थी कि उनकी ये अनजान बहनें यूं राखी बांधने पहुंच जाएंगी। पर जैसे ही इन बहनों ने सैनिकों के राखी बांधी तो माहौल एकबारगी भावुकता से भर उठा और सैनिकों की आंखे भर आई। यहां पहुंची युवतियां भी सैनिकों के इस स्नेह व प्यार तथा घर से दूर रहने के दर्द को देख अपने आंसू नहीं रोक पाई। बोर्डर पर राखी बांधने पहुंची अशोकनगर निवासी रश्मी अरोड़ा ने इन भावुक पलों के बीच बताया कि उसका कोई भाई नहीं है और इसी कारण वह सैनिक भाईयों को राखी बांधने आई है। उन्होंने कहा कि सैनिक भाईयों से बढ़कर शायद ही कोई भाई हो जो हमारी और हमारे देश की रक्षा कर सके। ऐसे ही प्रीति ने कहा कि सैनिकों का घर, परिवार हम ही तों है और इसलिए हर बार इन्हें राखी बांधने आएंगी। हिंदुमलकोट की रीना का भी यही मानना है, वे कहती हैं कि यदि सैनिक भाई हमारी रक्षा की खातिर घर से इतनी दूर बैठे हैं तो हमारा भी फर्ज बनता है कि हम इन सच्चे व वीर भाईयों की कलाइयों पर राखी सजाएं। भावुक हुए सैनिक भी इन बहनों के स्नेह को पाकर बेहद खुश थे। उन्होंने कहा कि घर से दूर होने के बावजूद आज उन्हें घर की कमी नहीं खल रही। सैनिकों ने कहा कि यदि हर वर्ष, हर त्यौहार पर ऐसा माहौल हर बोर्डर चौकी पर हो तो उनके हौसलो को चार चांद लग जाएंगे।
Saturday, August 14, 2010
Wednesday, June 2, 2010
मां तूझे सलाम
सुरमाओं की धरा हिंदुस्तान के सैनिक जहां सरहदों पर दुश्मन के छक्के छुड़वाते हैं, वहीं उनके होनहार नन्हे-मुन्ने सपूत भी किसी से कम नहीं है। वे यदा-कदा मौका मिलने पर खुद की काबलियत को पेश कर ही देते हैं। ऐसा ही एक सुनहरा व रंगारंग मौका उन्हें राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में स्थित साधुवाली सैन्य छावनी में मिला। बस, फिर क्या था.........यहां इन लाडलों ने ऐसा रंग जमाया कि देखने वालों ने दांतो तले अंगूली दबा ली। निश्चित ही उन्होंने सरहद पर सीना तान खड़े अपने रणबांकुरे पिता को गौरवांवित कर दिया।
कार्यक्रम का आयोजन राजस्थान की स्पेशल 13 गर्नेडियर गंगा जैसलमेर की ओर से किया गया। जिसमें सैन्य कर्मियों के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने धूम मचा दी। यहां प्रस्तुत राजस्थानी झांकी को हर कोई निहारने पर मजबूर हो गया। फिर वो चाहे चरखा चलाती सोहणी मुटियार हो या ऊंट पर बैठा गबरू, या फिर चूल्हे पर खाना बनाती गजबण नार या चौपाल में हथाई करते बुजुर्गवार। इस पर राजस्थानी परिधान में सजे सैन्य कर्मियों ने चंग के थापों से राजस्थानी खुशबू का अहसास बखूबी दिलाया। इन्हीं दिलकश नजारों को देखिए कैमरे की नजरों से .....
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