गुमनाम सी ये जिंदगी..........कभी खलासी तो कभी शनि उपासक बनती है। नेहरू, गांधी के दावे, दावे ही रह गए...... न बचपन बदला.... न बदहाली।
Monday, July 18, 2011
Monday, February 14, 2011
विवेक स्वतंत्रता चाहता है...
व्यक्ति, जितना बुद्धिमान होगा, उतना स्वयं के ढंग से जीना चाहेगा। सिर्फ बुद्धिहीन व्यक्ति पर ऊपर से थोपे गए नियम प्रतिक्रिया, रिएक्शन पैदा नहीं करेंगे। तो, दुनिया जितनी बुद्धिहीन थी, उतनी ऊपर से थोपे गए नियमों के खिलाफ बगावत न थी। जब दुनिया बुद्धिमान होती चली जा रही है, बगावत शुरू हो गई है। सब तरफ नियम तोड़े जा रहे हैं। मनुष्य का बढ़ता हुआ विवेक स्वतंत्रता चाहता है
Sunday, February 6, 2011
धर्म के नाम पर
लाज लुटती है दंगों में किसी सीता की
सारे पैगम्बरों की नींद उचट जाती है
कत्ल जब राम का कोई रहीम करता है
कुरान-ए-पाक भी उदासी में सिमट जाती है
लाश बेटे की आंसुओं से भीगोने वाला
बाप तो बाप है हिंदू या मुसलमान नहीं
मां की रोती हुई ममता की कोई जात नहीं
बहन के गम की कोई मजहबी पहचान नहीं
जो हुमायुं की कलाई पर बांधे थे कभी
तुम्हें कसम उन रेशमी धागों की
कसम है तुम्हें नानक ओ चिश्ती की आत्माओं की
सारी दुनिया को जो पैगाम-ए-अमन देती हैं
अब कोई कत्ल न हो मजहबी जुनूं के लिए
धर्म के नाम पर कोई लाश न गिरने पाए
अब कोई मां न करे जवां बेटे को रुखसत
किसी बहन के हाथों में राखी मुरझाए
हैं एक मां के बेटे, सारे ही देशवासी
बाहें गले में डाले, मिलकर चलें दुबारा
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलसितां हमारा.
साभार - दिलचस्प
Friday, January 21, 2011
नया भारत, क्रांति शुरू हो गई है : ओशो
अतीत के इतिहास में क्रांतियाँ होती थीं और समाप्त हो जाती थीं। लेकिन आज हम सतत क्रांति में जी रहे हैं। अब क्रांति कभी समाप्त नहीं होगी। पहले क्रांति एक घटना थी, अब क्रांति जीवन है। पहले क्रांति शुरू होती थी और समाप्त होती थी। अब क्रांति शुरू हो गयी और समाप्त नहीं होगी। अब आने वाले भविष्य में मनुष्य को सतत क्रांति और परिर्वन में ही रहना होगा। यह एक इतना बड़ा नया तथ्य है, जिसे स्वीकार करने में समय लगना स्वाभाविक है।Thursday, January 20, 2011
Saturday, November 6, 2010
बारूद पर ढेर है भारत का भविष्य
एक बच्चा पटाखा बनाए और दूसरा उसे जलाकर दीपावली मनाए. ऐसी विडम्बना तमिलनाडु के शिवकाशी में आसानी से देखी जा सकती है. जहां एक ओर देश के हरेक कोने का बचपन रोशनी के पर्व को मनाने के अपने तरीके व योजना बना रहा है, वहीं शिवकाशी जो आतिशबाजी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जहां करीबन 40 हजार बाल मजदूर उनकी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए पटाखे बनाने में सक्रिय हैं. शिवकाशी वह क्षेत्र है जिसे देश की आतिशबाजी राजधानी के रूप में जाना जाता है. यहां लगभग एक हजार छोटी-बड़ी इकाइयां बारूद व माचिस बनाने में बनाने में जुटी हैं जिनका सालाना कारोबार 1000 करोड़ रूपए है. इस उद्योग के चलते एक लाख लोगों की रोजी चलती हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं.
बाल श्रम नाम के अभिशाप की जहां बात चल ही गई है तो यह स्पष्ट कर दें कि शिवकाशी में इसका प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है. मसलन, पंद्रह वर्षीय पोन्नुसामी जो यहां एक पटाखा निर्माणी इकाई में कार्यरत है, पांच साल पटाखे बना रहा है. जब उसने यह पेशा चुना तो उसकी समझ का स्तर क्या रहा होगा यह विचारणीय मसला है. उसके अनुसार वह छठी कक्षा का छात्र था जब उसे जबरन इस काम में उतार दिया गया. काम कराने की मंशा भी उनके माता-पिता की ही थी.प्रतिदिन नौ घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वह 60 रूपए पाता है. यह बेगारी उसे वयस्क श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी का केवल चालीस फीसदी है. ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि शिवकाशी इलाके के किशोर-किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई में गाज गिरने की आशंका रहती है. छोटी उम्र में ही ऐसे खतरनाक काम में झोंकने के मां-बाप के फैसले के पीछे उनकी गरीबी ही मूल कारण है.
कारखानों में हादसे सामान्यत: होते रहते हैं. ऐसे में मासूमों को घातक काम पर लगाने का सवाल जब उठता है तो श्रमिक संगठनों का जवाब होता है कि मृतकों में कोई भी किशोर नहीं है,जबकि दास्तां कुछ अलग ही है. जुलाई 2009 में हुई एक दुर्घटना में तीन बच्चे मर गए. अगस्त 2010 में तो सरकारी अधिकारियों पर ही गाज गिरी जो अनाधिकृत पटाखा इकाइयों की जांच पर गए थे. बताया गया है कि 8 राजस्व और पुलिस अधिकारियों को इस तहकीकात के दौरान जान से हाथ धोना पड़ा. जब पोन्नुसामी से काम के जानलेवा होने के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब यही था कि अगर मैं भाग्यशाली हूं तो कभी हादसा नहीं होगा. बच्चों के अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अधिकारी जॉन आर की मानें तो शिवकाशी में करीबन 1050 कारखाने हैं जिनमें से 500 बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं. पटाखों के अलावा 3989 कारखानों में दियासलाई बनती है. वे मानते हैं देश-विदेश में हो रहे प्रयासों के नतीजतन बाल श्रम पर कुछ अंकुश लगा है. हादसों में इजाफा और बच्चों के काम पर लगाने की नौबत गैर लाइसेंसशुदा कारखानों की वजह से आती है जिनका संचालन घरों की असुरक्षित चारदीवारी में होता है. इन लोगों को लाइसेंस वाली कंपनियां पटाखे बनाने का आदेश दे देती है. अधिक फायदे के लालच व शिक्षा के अभाव में ये लोग आसानी से कानून की दहलीज को लांघ जाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर शिवकाशी की ही एक एनजीओ के कार्यकर्ता के अनुसार इस समस्या के बारे में समझ अभी अधूरी है. हम अभिभावकों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें यह समझाया जा रहा है कि वे सीमित आमदनी में गुजर-बसर करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान दें. कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. इसी तर्ज पर सरकार, प्रशासन व एनजीओ का प्रयास भी तब तक सफल नहीं हो जाता जब तक कि अन्य पक्षकार जिनमें आतिशबाजी निर्माण इकाइयों के मालिक व अभिभावक शामिल हैं, स्वेच्छा से पहल न करें. अन्यथा उनकी दीपावली कभी भी प्रकाशमान नहीं हो पाएगी. साभार - शिरीष खरे
Saturday, October 30, 2010
सरहद पर परेशान किसान
श्रीगंगानगर। भारत-पाक सरहद पर बसे किसान इन दिनों खासी परेशानी का सामना कर रहे हैं। हालाद इस कदर बिगड़े हुए हैं कि किसान मरने तक को तैयार हैं, लेकिन उनकी समस्या पर न तो नौकरशाह गौर कर रहे हैं और न ही सफेदपोश। दरअसल, लंबे समय से विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे किसानों के सामने हाल ही में आए एक सरकारी फरमान ने कई दुविधाएं खड़ी कर दी हैं'। इस फरमान के मुताबिक सीमा क्षेत्र में तारबंदी के पार दो फिट से ज्यादा ऊंची फसल पर पाबंदी लगा दी गई है। जबकि किसान सीमा क्षेत्र में जो भी फसल बोते हैं, उनकी ऊंचाई दो फिट से अधिक ही है। उक्त समस्या को लेकर किसान जिला प्रशासन से मिल चुके हैं और वे सरकार को भी अपनी समस्या से अवगत करवा चुके हैं। बहरहाल, किसान गुजारिश करते दिखे कि या तो उनकी जमीन को सरकार अपने कब्जे में लेकर हमें मुआवजा दे दे या सीमा पर खड़ा कर हमें गोली मार दे। वाकई में, यदि हालात यही रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इस साधन-संपन्न जिले के सीमावर्ती किसान रोटी-रोटी को मोहताज हो जाएंगे।
यहां के ग्रामीण बताते हैं कि वे लंबे समय से परेशान हैं, लेकिन उनकी समस्या सुनने वाला कोई नहीं है। न तो सरकार और न ही अधिकारी इस ओर ध्यान दे रहे हैं तथा नेताओं से उम्मीद करना ही बेमानी लगता है। सीमावर्ती गांव खखां के दारासिंह कहते हैं कि जब से दो फिट से ऊंची फसल न बोने का फरमान आया है, वह इसी ऊहापोह में है कि आखिर खेत में क्या बोएगा। खुद के साथ-साथ उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता भी सताने लगी है। बकौल दारासिंह, 'पता नहीं वो कौन सी मनहूस घड़ी थी, जब सियासतदानों की कारगुजारियों के चलते देश का बंटवारा हुआ और आज हमें ये दिन देखने को मिले। अब तो हर रोज नई समस्या से जूझना हमारी नियती बन चुका है, लेकिन अब और बर्दास्त नहीं होता।' इसी तरह बुजुर्ग गुरप्रीतकौर कहती हैं कि यहां वर्ष 1984 के दौरान तारबंदी होनी शुरू हुई और करीब 22 वर्ष पूर्व (वर्ष 1989) तक यहां तारबंदी हो चुकी थी। इसी के साथ ही उनके बुरे दिन शुरू हो गए, क्योंकि तारबंदी के दौरान उनकी जमीनें उस पार चली गई। ऐसी ही बदहाल स्थिति गुरजंटसिंह के परिवार की है। ग्वार की फसल पकान पर है, लेकिन उसे काटने की इजाजत नहीं मिल रही है। गुरजंटसिंह नेताओं व अधिकारियों से मिलकर वह गुजारिश करता घूम रहा है कि सरकार उसे गोली मार दे तो ठीक है, ताकि सारी समस्या ही खत्म हो जाए। गुरजंटसिंह ने बताया कि उसकी जमीन में कॉटन व सरसों की फसल बहुत अच्छी होती है, लेकिन जो आदेश जारी किए गए हैं वे तो सरासर अन्याय है। अपने जवान बेटे को खो चुकी नसीबकौर ने बताया कि तारबंदी के उस पार जमीन होने के कारण हमेशा ही संकट खड़े होते रहे हैं। यही वजह है कि उनका एक बेटा मजदूरी करता-करता चल बसा। अब दो बेटियों की शादी करनी है, लेकिन नसीबकौर दो जून की रोटी को भी तरस रही हैं। बहरहाल, किसानों को केंद्र व राज्य सरकार से अब भी आस बंधी हुई है।
किसानों का कहना है कि यदि पंजाब में जमीनों का मुआवजा दिया जा सकता है तो फिर राजस्थान के किसानों से सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है? यही नहीं यदि सुरक्षा के नाम पर ऐसे आदेश जारी किए जाते हैं तो फिर दूसरे इलाकों में तारबंदी के समीप हालात बदतर क्यों है और सरकार उस इलाके के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती? आखिर हमेशा से ही किसी न किसी तरह की मार झेलते आ रहे किसान ही इस आदेशों की चपेट में क्यों आ रहे हैं? वो भी उस हालात में जब किसान अपनी जमीन सरकार को सौंपने को तैयार हैं? उधर जिला कलेक्टर सुबीर कुमार भी मानते हैं कि किसानों की समस्या जायज है तथा वे कहते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर बीएसएफ ने एक नॉटीफिकेशन जारी किया है, जिसके मुताबिक किसान तारबंदी के पास दो फिट से ऊंची फसल की बुआई नहीं कर सकेंगे। उनका मानना है कि निश्चित ही यह सुरक्षा का मुद्दा है, लेकिन किसानों की समस्या भी वाजिब है। जैसे भी संभव होगा, हम किसानों की इस जायज मांग को राज्य सरकार के जरिए केंद्र सरकार तक पहुंचाएंगे।
Subscribe to:
Posts (Atom)







