Thursday, February 18, 2010

वतन बेच देगें।

कली बेच देगें चमन बेच देगें,
धरा बेच देगें गगन बेच देगें,
कलम के पुजारी अगर सो गये तो
ये धन के पुजारी
वतन बेच देगें।



जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" }
http://www.janokti.com/

3 comments:

  1. exceelent creation
    ye pankti padhke bhi nahi jage to ye kabhi nahi jaag sakte .

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  2. वजा फरमाया आपने ।

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  3. बेचने की गुंजाइश रही कहां, बेच चुके हैं. जो थोड़ा सा बाकी है उसे जरूर बेच देंगे.

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